Saturday, August 6, 2016

जानिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी भोलेनाथ को कांवर चढ़ाया था -

सावन माने रिमझिम फुहारों का मौसम और मेरे प्रभु भोलेनाथ का महीना। यही वह महीना है, जब भोलेनाथ, कैलाश से उतरकर शिवालयों में विराजमान होते हैं। सावन भर भोलेनाथ भक्तों की फरियाद सुनते हैं। सावन और शिव की चर्चा जब-जब की जाएगी, कांवर की भी बातें होंगी। सावन में शिव सुनते हैं, इसलिए भक्त कांवर लेकर शिवधामो की ओर चल पड़ते हैं।

कहते हैं कि पहले कांवरिया रावण थे। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी भोलेनाथ को कांवर चढ़ाया था। सावन के महीने में शिवालय गेरूआ वस्त्रधारियों के हर-हर महादेव के उद्घोष से गूंज जाता है। ऐसी मान्यता है कि भारत की पवित्र नदियों (गंगा) के जल से अभिषेक किए जाने से शिव प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं। संस्कृत के शब्द ‘कांवांरथी’ से बना है- कांवर। यह एक प्रकार की बहंगी है, जो बांस की फट्टी से बनाई जाती है। कांवर वह तब बनती है, जब फूल-माला, घंटी आर घुंघरू से सजे दोनों किनारों पर वैदिक अनुष्ठान के साथ गंगाजल का भार पिटारियों में रखा जाता है। धूप-दीप की खुशबू, मुख में ‘बोल बम’ का नारा, मन में ‘बाबा एक सहारा।’ कांवर उठाने वाले शिवभक्तों को कांवरिया कहते हैं।




कांवरियों के कई रूप और कांवर के कई प्रकार होते हैं। उनके तन पर सजनेवाला गेरूआ मन को वैराग्य का अहसास कराता है। ब्रह्मचर्य, शुद्ध विचार, सात्विक आहार और नैसर्गिक दिनचर्या कांवरियों को हलचल भरी दुनिया से कहीं दूर भक्ति-भाव के सागर किनारे ले जाते हैं। कांवर के कई प्रकारों में से ही एक प्रकार है – सामान्य कांवर। सामान्य कांवरिए कांवर यात्रा की अवधि में जब और जहां चाहे रुक कर विश्राम कर सकते हैं। विश्राम की अवधि में कांवर स्टैंड पर रखा जाता है, जिससे कांवर का स्पर्श जमीन से न हो सके। दूसरे प्रकार के भक्त ‘डाक कांवरिया’ कहलाते हैं। ये कांवर यात्रा के आरंभ से शिव के जलाभिषेक तक अनवरत चलते रहते हैं। बगैर रुके। शिवधाम तक की यात्रा एक निश्चित अवधि तय करते हैं। इस दौरान शरीर से उत्सर्जन की क्रियाएं तक वर्जित होती हैं। तीसरे प्रकार के भक्त खड़ा कांवर लेकर चलते हैं। इस दौरान उनकी मदद के लिए कोई-न-कोई सहयोगी उनके साथ चलता है। जब वे आराम करते हैं, तब सहयोगी अपने कंधे पर उनका कांवर लेकर कांवर को चलने के अंदाज में हिलाते-डुलाते रहते हैं। चौथे प्रकार के भक्त नदी तट से शिवधाम तक की यात्रा दंड देते पूरी करते हैं। मतलब पूर्ण कांवर पथ की दूरी को अपने शरीर की लंबाई से लेटकर दांडी कांवरिया नापते हुए यात्रा पूरी करते हैं।



इस कलयुग में सत्युग का अगर आप अहसास करना चाहते हैं, तो सावन के महीने में कांवरिया पथ में पधारिए। कांवर मेला में सत्युग का वातावरण बना रहता है। आज दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, यूपी, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ व मध्य-प्रदेश से शिवभक्त कांवर मेले में शामिल होते हैं और हरिद्वार में जलाभिषेक करते हैं। दिल्ली से हरिद्वार के कांवर पथ के साथ-साथ देश के समस्त कांवर पथों पर देवाधिदेव महादेव का वास होता है। ऐसा कांवरिया मानते हैं। संपूर्ण कांवर पथ पर पूरब-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकता सावन आते ही जीवित हो उठती है। शिवभक्ति का यह सबसे बड़ा मैराथन है।

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